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Transcription of dictation no. 1
बीसवीं सदी के पूर्वार्ध तक सरकारों का काम कानून व्यवस्था बनाए रखना एवं देश की सुरक्षा करना माना जाता था। इसीलिए भारत में अंग्रेजों के शासनकाल में दो ही प्रमुख सेवाएं थी। एक तो भारतीय नागरिक सेवा तथा दूसरी भारतीय सैन्य सेवाएं। ऐसा नहीं कि उन दिनों निर्माण कार्य नहीं हुए किन्तु विदेशी शासन होने के कारण आम जनता की सरकार से बहुत ज्यादा अपेक्षाएं नहीं थी। प्रसाशन की जवाबदेही भी भारत की जनता के प्रति न होकर इंग्लैण्डke सम्राट तथा उसके भारत में प्रतिनिधि वायसराय के प्रति थी। उस समय प्रसाशन में जटिलता नहीं थी। आजादी के बाद लोककल्याणकारी राज्य के रूप में सरकार की जिम्मेदारी में आर्थिक विकास के साथ सामाजिक न्याय भी सरकार के कर्तव्यों में शामिल हो गया। शासन व प्रशासन का लक्ष्य सुशासन होता है। पहले उत्तम कानून एवं व्यवस्था बनाए रखना सुशासन कहलाता था। अब सुशासन के अंतर्गत न केवल कानून एवं व्यवस्था बल्कि आर्थिक विकास लोककल्याण एवं सामाजिक न्याय के निर्धारित मानदण्डों को पूरा करना भी शामिल हो गया है।

सुशासन की दिशा में प्रशासनिक सुधर एवं निरंतर प्रक्रिया है। भारत में अंग्रेजों के समय भी प्रशासनिक सुधार पर समय – समय पर विचार होता रहा है। आजादी के बाद तो जनापेक्षी शासन की वजह से इस पर विचार होते रहे हैं। १९४९ में गोपाल स्वामी आयंगर ने प्रशासन में सुधर तथा पुनर्गठन के लिए अपना प्रतिवेदन दिया था। योजना आयोग द्वारा प्रशासकीय सुधार हेतु गठित गोरावला समिति ने अपने सुझाव दिए। तत्पश्चात एप्पल बाई समिति गठित की गयी। इसकी सिफारिश पर ही १९५६ में नई दिल्ली में भारतीय लोक प्रसाशन संस्था (आई0 आई0 पी0 ए0) की स्थापना हुई। इन ५३ वर्षों में भारतीय लोक प्रसाशन संस्थान भारत के सबसे अधिक प्रतिष्ठित एवं क्रियाशील अधय्यन संस्थान के रूप में उभरा है। इसकी न केवल हर राज्य में शाखाएं बल्कि राज्यों के बड़े नगरों में शाखाएं हैं।

१९६६ में मोरारजी देशाई की अध्यक्षता में भारत के प्रथम प्रसाशनिक सुधार आयोग की स्थापना की गयी। इस आयोग ने प्रसाशनिक सुधार के गहराई एवं विस्तार से अध्ययन हेतु २० अध्ययन दल एवं १३ कार्यकारी समूह तथा एक कार्यदल का गठन किया। आयोग ने अपने ४ वर्ष के कार्यकाल में २० प्रतिवेदन दिए, जिनमें लगभग ५८० से अधिक अनुशंसाएं की गयी थी। प्रथम आयोग द्वारा इतने विशाल पैमाने पर अध्ययन करके अनुशंसाएं किये जाने के बाद भी १९८० तक अलग अलग विषयों पर विचार करने के लिए दर्जनों आयोग एवं समितियां गठित की जाती रही।
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Transcription of dictation no. 2
सुधारों की निरंतर प्रक्रिया से भी बदलाव आता है। उदाहरण के लिए वर्तमान पंचायती राज संस्थान सुधारों का ही परिणाम है। ३१ अगस्त २००५ में वीरप्पा मोइली की अध्यक्षता में द्धितीय प्रशासनिक सुधर आयोग गठित किया गया। इस आयोग ने भारत के प्रशासनिक ढांचा, कार्मिक प्रशासन के पुनर्गठन, वित्तीय प्रशासनिक प्रणाली का सुदृढ़ीकरण, राज्य स्टार एवं जिला स्तर पर पभावी प्रशासन, पंचायतीराज एवं नागरिक प्रशासन, नागरिक केंद्रित प्रशासन, ई0 प्रशासन का प्रोत्साहन आदि पर विचार किया। मोइली आयोग अभी तक १५ प्रतिवेदन केंद्र सरकार को सौंप चुका है। भारतीय लोग प्रशासन संस्थान के २९ अक्टूबर को आयोजित किये जाने वाले वार्षिक सम्मलेन की सेमीनार में भारत में प्रशासनिक सुधार पर विस्तार से चर्चा की जानी है। इस सम्मलेन से पूर्व संस्थान की राज्य शाखाओं द्वारा सितम्बर माह में इसी विषय पर एवं राज्य प्रतिवेदन चर्चा हेतु संगोष्ठियां आयोजित की गई। सवाल उठता है कि मोइली आयोग द्वारा पुरे देश भर में किये गए दौरे एवं सभी वर्गों से की गयी चर्चा एवं अधययन के बाद अब लोक प्रशासन संस्थान की सेमिनारों से इतनी जल्दी क्या नया हासिल होने वाला है।
उदाहरण के लिए वित्तीय प्रशासन प्रणाली का सुदृढ़ीकरण विषय को चर्चा हेतु चुना जा सकता था। दूसरा विषय पंचायती राज संस्थान एवं स्थानीय शासन हो सकता था। तीसरा विषय प्रशासन में आचार नीति भी हो सकती है। सितम्बर माह में भारतीय लोग प्रशासन संस्थान की राज्य एवं स्थानीय शाखाओं द्वारा प्रशासनिक सुधार विषय पर आयोजित संगोष्ठियों में जो आलेख पढ़े गए एवं जो विचार व्यक्त किये गए उनमे ऐसा नया कुछ भी नहीं था, जिसमे पूर्व में चर्चा न हो चुकी है। मुझे सितम्बर माह में दो राज्य शाखाओं की संगोष्ठियों में उपस्थित होने का अवसर मिला। पहली राज्य संगोष्ठी में मुझ सरीखे एक या दो लोग छोड़कर सभी भारतीय प्रशासनिक सेवा के सेवानिवृत अधिकारी थे। इस संगोष्ठी में अधिकांश वक्ताओं का कहना था कि प्रशासनिक सुधार में सबसे बड़े बाधक राज्यों के नेता लोग हैं। जो नियम कायदों में विश्वास ही नहीं रखते। जो नेता जितना अधिक नियम कायदों को तोड़ता है उतना ही दबंग नेता कहलाता है। वक्ताओं का मत था कि भारत में गुजरात को छोड़कर राजनैतिक हस्तक्षेप आम हो गया है। अगर सभी राजनैतिक दल तय कर लें कि वे प्रशासन में हस्तक्षेप नहीं करेंगे तभी प्रशासन में सुधार लाया जा सकता है।
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