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Transcription of dictation no. 3

मुझे जिस दूसरी संगोष्ठी में शामिल होने का अवसर मिला उसमे प्राध्यापकों की संख्या प्रशासनिक अधिकारियों से अधिक थी। संभवतः इसलिए चर्चा एक या दो विषय पर केंद्रित होने की बजाय संतुलित थी। देखा जाय तो भारतीय लोक प्रशासन संस्थान मूल रूप से प्रशासनिक अधिकारियों एवं लोक प्रशासन के अध्यनकर्ताओं की संस्था है, लेकिन मद्रास विश्व विद्यालय के अर्थशास्त्र का प्राध्यापक एवं कुलपति प्रो. शंमुगासुन्दरम ने जिस तरह से शिक्षा विदों को इस संस्थान का सदस्य बनने को प्रेरित किया इसका परिणाम यह हुआ कि अनेक शाखाओं में प्राध्यापक एवं टेक्नोक्रेट अधिक सक्रिय हैं। यही कारन है कि दो दशक तक प्रो. शंमुगासुन्दरम एवं उनकी पत्नी डॉ ० यशोदा शंमुगासुन्दरम संस्थान की २० सदस्यीय कार्य समिति के सदस्य निर्वाचित होकर आते रहे हैं। दूसरी संगोष्ठी में वक्ताओं ने राजनेताओं के साथ – साथ प्रशासनिक अधिकारियों को भी कुशासन की लिए बराबर का जिम्मेदार ठहराया। कुछ वक्ताओं का कहना था कि आम जनता तृतीय वर्ग के कर्मचारियों के व्यवहार एवं अनुशासनहीनता से जनता को ज्यादा परेशानी होती है।

संगोष्ठी में गैर सरकारी संगठनों की भूमिका पर भी चर्चा हुई। देखना यह है कि भारतीय लोक प्रशासन संस्थान की २९ अक्टूबर को होने वाली सेमीनार से क्या निष्कर्ष निकलकर आते हैं ? भारत में अनेक राज्य सरकारों द्वारा भी प्रशासनिक सुधार आयोग स्थापित किये गए। इन आयोगों के अध्यक्ष राज्य शासन के सेवानिवृत मुख्य सचिव जब प्रशासनिक मुखिया के रूप में सभी शक्तियां रहते सुधार नहीं कर पाए तो आयोग के अध्यक्ष के रूप में सुझाव देकर क्या कर पाते ? कुलमिलाकर राज्यों के प्रशासनिक सुधार आयोग वास्तविकता में प्रशासनिक अधिकारी पुनर्वास आयोग ही साबित हुए।

छत्तीसगढ़ में राज्य प्रशासनिक सुधर आयोग के अध्यक्ष एवं पूर्व मुख्य सचिव आयोग के दो वर्ष के कार्यकाल में आराम फरमाते हुए छत्तीसगढ़ से विदा हो गए। संभवतः ऐसी कारण से मोइली आयोग से अपेक्षा की गयी थी की वह राज्य प्रशासन में सुधार का भी अध्ययन करेगा। शासन द्वारा लोक कल्याण की कितनी ही घोषणाएं क्यों न कर लें, भ्रष्टाचार के कारण उनका वास्तविक लाभ आम जनता तक पहुचना मुश्किल होता है। सुशासन के लिए भ्रष्टाचार पर रोकथाम जरुरी है। वैसे भारत में प्रशासन में भ्रष्टाचार को रोकने के लिए प्रयास १९६० के दशक से ही प्रारम्भ हो गए थे। केंद्रीय संशाधन समिति ने प्रशासन में भ्रष्टाचार रोकने के लिए एक स्थाई निकाय की स्थापना का सुझाव दिया था जिसके फलस्वरूप सतर्कता आयोग की स्थापना की गयी। भ्रष्टाचार पर अंकुश के प्रयासों के बावजूद प्रशासन में भ्रष्टाचार बढ़ता ही जा रहा है।

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